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Tuesday, 31 December 2013

जानिए हिंदू धर्म के पवित्र पक्षी

हंस : जब कोई व्यक्ति सिद्ध हो जाता है तो उसे कहते हैं कि इसने हंस पद प्राप्त कर लिया और जब कोई समाधिस्थ हो जाता है, तो कहते हैं कि वह परमहंस हो गया। परमहंस सबसे बड़ा पद माना गया है। पक्षियों में हंस एक ऐसा पक्षी है जहां देव आत्माएं आश्रय लेती हैं। यह उन आत्माओं का ठिकाना हैं जिन्होंने अपने जीवन में पुण्यकर्म किए हैं और जिन्होंने यम-नियम का पालन किया है। कुछ काल तक हंस योनि में रहकर आत्मा अच्छे समय का इंतजार कर पुन: मनुष्य योनि में लौट आती है या फिर वह देवलोक चली जाती है। हंस पक्षी प्यार और पवित्रता का प्रतीक है। यह बहुत ही विवेकी पक्षी माना गया है। आध्यात्मिक दृष्टि मनुष्य के नि:श्वास में 'हं' और श्वास में '' ध्वनि सुनाई पड़ती है। मनुष्य का जीवन क्रम ही 'हंस' है क्योंकि उसमें ज्ञान का अर्जन संभव है। अत: हंस 'ज्ञान' विवेक, कला की देवी सरस्वती का वाहन है। यह पक्षी अपना ज्यादातर समय मानसरोवर में रहकर ही बिताते हैं या फिर किसी एकांत झील और समुद्र के किनारे।
यह पक्षी दांपत्य जीवन के लिए आदर्श है। यह जीवन भर एक ही पार्टनर के साथ रहते हैं। यदि दोनों में से किसी भी एक पार्टनर की मौत हो जाए तो दूसरा अपना पूरा जीवन अकेले ही गुजार या गुजार देती है। जंगल के कानून की तरह इनमें मादा पक्षियों के लिए लड़ाई नहीं होती। आपसी समझबूझ के बल पर ये अपने साथी का चयन करते हैं। इनमें पारिवारिक और सामाजिक भावनाएं पाई जाती है। सफदे रंग के अलावा काले रंग के हंस ऑस्ट्रेलिया में पाए जाते हैं। हिंदू धर्म में हंस को मारना अर्थात पिता, देवता और गुरु को मारने के समान है। ऐसे व्यक्ति को तीन जन्म तक नर्क में रहना होता है।

मोर : मोर को पक्षियों का राजा माना जाता है। यह शिव पुत्र कार्तिकेय का वाहन है। भगवान कृष्ण के मुकुट में लगा मोर का पंख इस पक्षी के महत्व को दर्शाता है। यह भारत का राष्ट्रीय पक्षी है। इसकी दो प्रजातियां हैं- नीला या भारतीय मोर (पैवो क्रिस्टेटस), जो भारत और श्रीलंका (भूतपूर्व सीलोन) में पाया जाता है। हरा या जावा का मोर (पैवो म्यूटिकस), जो म्यांमार (भूतपूर्व बर्मा) से जावा तक पाया जाता है। अनेक धार्मिक कथाओं में मोर को बहुत ऊंचा दर्जा दिया गया है। हिन्दू धर्म में मोर को मार कर खाना महापाप समझा जाता है। मोर की उम्र 25 से 30 वर्ष तक होती है।

कौआ : कौए को अतिथि-आगमन का सूचक और पितरों का आश्रम स्थल माना जाता है। कौआ लगभग 20 इंच लंबा, गहरे काले रंग का पक्षी है, जिसके नर और मादा एक ही जैसे होते हैं। जिस दिन किसी कौए की मृत्यु हो जाती है उस दिन उसका कोई साथी भोजन नहीं करता है। कौआ अकेले में भी भोजन कभी नहीं खाता वह किसी साथी को साथ ही मिल बांटकर भोजन ग्रहण करता है। कौआ बगैर थके मीलों उड़ सकता है। कौए को भविष्य में घटने वाली घटनाओं का पहले से ही आभास हो जाता है। श्राद्ध पक्ष में कौओं का बहुत महत्व माना गया है। इस पक्ष में कौओं को भोजना कराना अर्थात अपने पितरों को भोजन कराना माना गया है।

उल्लू : उल्लू को लोग अच्छा नहीं मानते और उससे डरते हैं, लेकिन यह गलत धारणा है। उल्लू लक्ष्मी का वाहन है। उल्लू का अपमान करने से लक्ष्मी का अपमान माना जाता है। हिन्दू संस्कृति में माना जाता है कि उल्लू समृद्धि और धन लाता है। डरावने लुक के कारण कुछ लोग उल्लू से डरते भी हैं और कुछ लोग उन लोगों को मूर्ख कहते हैं जिनके उल्लू जैसे मुंह होते हैं, लेकिन यह धारणा गलत है। भारत वर्ष में प्रचलित लोक विश्वासों के अनुसार भी उल्लू का घर के ऊपर छत पर स्थि होना तथा शब्दोच्चारण निकट संबंधी की अथवा परिवार के सदस्य की मृत्यु का सूचक समझा जाता है। सचमुच उल्लू को भूत-भविष्य और वर्तमान में घट रही घटनाओं का पहले से ही ज्ञान हो जाता है। उल्लू नीरव उड़ान भरने में पारंगत है। अर्थात पंखों की फड़फड़ाहट या आवाज किए बगैर ही यह मीलों उड़ सकता है। उल्लू की आंखे रात में दूर तक देखने की क्षमता रखती है। यह प्राणी दिन में सोता और रात में जागता है। उल्लू की श्रवण-शक्ति भी तीव्र होती है। यह उपर उड़ान भरते वक्त नीचे चूहे की आवाज सुन लेता है। उल्लू की सिर घुमाने की योग्यता भी अद्वितीय हैं क्योंकि वे लगभग 170 अंश तक अपना सिर घुमा सकते हैं। अर्थात मात्र सिर घुमाकर वे ठीक अपने पीछे देख सकते हैं। लिंगपुराण में नारद मुनि को मानसरोवर वासी उलूक से संगीत शिक्षा ग्रहण करने के लिए उपदेश दिया गया था। इस उलूक की हू हू हू हू सांगीतिक स्वरों में निकलती है। वाल्मीकि रामायण में उल्लू को मूर्ख के स्थान पर अत्यन्त चतुर कहा गया। रामचंद्र जी जब रावण को मारने में असफल होते हैं और जब विभीषण उनके पास जाते हैं, तब सुग्रीव राम से कहते हैं कि उन्हें शत्रु की उलूक-चतुराई से बचकर रहना चाहिए। ऋषियों ने गहरे अवलोकन तथा समझ के बाद ही उलूक को श्रीलक्ष्मी का वाहन बनाया था।

गरूड़ : इसे गिद्ध भी कहा जाता है। पक्षियों में गरूढ़ को सबसे श्रेष्ठ माना गया है। यह समझदार और बुद्धिमान होने के साथ-साथ तेज गति से उड़ने की क्षमता रखता है। गरूड़ के नाम पर एक पुराण भी है गरूड़ पुराण। यह भारत का धार्मिक और अमेरिका का राष्ट्रीय पक्षी है। गरूड़ के बारे में पुराणों में अनेक कथाएं मिलती है। रामायण में तो गरूढ़ का सबसे महत्वपूर्ण पार्ट है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु की सवारी और भगवान राम को मेघनाथ के नागपाश से मुक्ति दिलाने वाले गरूड़ के बारे में कहा जाता है कि यह सौ वर्ष तक जीने की क्षमता रखता है। लेकिन आज कल गरूढ़ के अस्तित्व पर संकट गहरा रहा है।

नीलकंठ : नीलकंड को देखने मात्र से भाग्य का दरवाजा खुल जाता है। यह पवित्र पक्षी माना जाता है। दशहरा पर लोग इसका दर्शन करने के लिए बहुत ललायित रहते हैं। इससका आकार मैना के बराबर होता है। इसकी चोंच भारी होती है, वक्षस्थल लाल भूरा, उदर, तथा पुच्छ अधोतल नीला होता है। पंख पर गहरे और धूमिल नीले रंग के भाग उड़ान के समय चमकीली पट्टियों के रूप मे दिखाई पड़ते हैं। त्रावणकोर के दक्षिण भाग को छोड़कर शेष भारत में यह पक्षी पाया जाता है।

तोता : इसे मिट्ठू भी कहते हैं। तोते का हरा रंग बुध ग्रह के साथ जोड़कर देखा जाता है। अतः घर में तोता पालने से बुध की कुदृष्टि का प्रभाव दूर होता है। घर में तोते का चित्र लगाने से बच्चों का पढ़ाई में मन लगता है। वास्तुशास्त्र के अनुसार उत्तर दिशा में तोते की तस्वीर को लगाने से पढ़ाई में बच्चों की रुचि बढ़ती है साथ ही उनकी स्मरण क्षमता में भी इजाफा होता है। इसके अलावा आपने बहुत से तोता पंडित देखें होंगे जो भविष्यवाणी करते हैं। तोते के बारे में बहुत सारी कथाएं पुराणों में मिलती है। इसके अलवा, जातक कथाओं, पंचतंत्र की कथाओं में भी तोते को किसी किसी कथा में शामिल किया गया है। तोता अक्सर तमाशा दिखाने वाले और जादूगरों के पास देखा जाता है। यह हरे रंग का 10-12 इंच लंबा पक्षी है, जिसके गले पर लाल कंठ होता है। तोता बहुत प्रिय सुंदर पक्षी है। यह सबका मनोरंजन करता है। तोता एक लोकप्रिय पक्षी हैं। इसकी आवाज़ छोटे बच्चे भी पहचानते हैं। यह मनुष्यों की बोली की नक़ल बखूबी कर लेता है। तोता एक बार में 4-6 अण्डे देते हैं और ज्यादातर पक्षियों की तरह नर मादा अपनी घरेलू जिम्मेदारी मिल-जुल कर निभाते हैं। अधिकांश प्रजातियां पेड़ की खोह में एक बार में चार से आठ अंडे देती हैं।

कबूतर : इसे कपोत कहते हैं। यह शांति का प्रतीक माना गया है। भगवान शिव ने जब अमरनाथ में पार्वती को अजर अमर होने के वचन सुनाए थे तो कबतरों के एक जोड़े ने यह वचन सुन लिए थे तभी से वे अजर-अमर हो गए। आज भी अमरनाथ की गुफा के पास ये कबूतर के जोड़े आपको दिखाई दे जाएंगे। कहते हैं कि सावन की पूर्णिमा को ये कबूतर गुफा में दिखाई पड़ते हैं। इसलिए कबूतर को महत्व दिया जाता है। पहले के जमाने में कबूतर ही डाकिये का काम करता था। पुराने समय में ही नहीं, बल्कि 19वीं सदी की शुरुआत में होने वाले पहले विश्वयुद्ध तक कबूतर के माध्यम से संदेश भेजा जाता था। अजीब है कि कबूतर मिलों तक जाकर यह संदेश देकर पुन: कैसे लौट आते होंगे। बताया जाता है कि होमिंग प्रजाति के कबूतर अपनी जगह से 1600 किमी आगे उड़कर जाने पर भी रास्ता भटके बिना वापस लौट आते थे। उनके उड़ने की रफ्तार भी 60 मील प्रति घंटा होती थी, जोकि संदेश एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने के लिए पर्याप्त थी। पक्षी-विज्ञानी बताते हैं कि ये कबूतर सूर्य की दिशा, गंध और पृथ्वी के चुम्बकत्व से वापस लौटने की दिशा तय करते थे। टेलीग्राफ, टेलीफोन और संदेश पहुंचाने की नई व्यवस्थाओं के साथ कबूतर संदेश भेजना खत्म हो गया। न्यूजीलैंड की ओटागो यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में पाया कि कबूतरों में शानदार गणितीय क्षमता होती है और वे नंबर जैसी चीजों तथा क्रम व्यवस्था को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।

rajanishdixit.blogspot.inगोरैया : गोरैया एक छोटी चिड़िया है। यह हल्की भूरे रंग या सफेद रंग में होती है। इसके शरीर पर छोटे-छोटे पंख और पीली चोंच पैरों का रंग पीला होता है। नर गोरैया का पहचान उसके गले के पास काले धब्बे से होता है। 14 से 16 से.मी. लंबी यह चिड़िया मनुष्य के बनाए हुए घरों के आसपास रहना पसंद करती है।
भारतीय पौराणिक मान्यताओं अनुसार यह चिड़ियां जिस भी घर में या उसके आंगन में रहती है वहां सुख और शांति बनी रहती है। खुशियां उनके द्वार पर हमेशा खड़ी रहती है और वह घर दिनोदिन तरक्की करता रहता है।इसके अलावा भी हिंदू धर्म में ऐसे और भी पक्षी हैं जिनका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है। पक्षियों को हिंदू धर्म में देवता और पितर माना गया है। कहते हैं जिस दिन आकाश से पक्षी लुप्त हो जाएंगे उस दिन धरती से मनुष्य भी लुप्त हो जाएगा। किसी भी पक्षी को मारना अपने पितरों को मारना माना गया है।